हल्दी क्या है? और इसका फायदा क्या है? आइये जानते हैं हम इस पोस्ट मे ।।

 हल्दी-इसका आकार भी अदरक जैसा होता है। पौधे की एक-एक फुट की चौड़ी पत्तियाँ होती हैं। पीले रंग के फूल वर्षा के दिनों में बड़े सुहावने लगते हैं। हल्दी के चूर्ण का उबटन किया जाता है। दाल शाक को पीला रंग देने के लिए हल्दी डालना शोभा भी बढ़ाता है, सुगंध भी देता है और गुणकारी भी होता है। खाज, खुजली, फुन्सी आदि में उसका सेवन उपयोगी रहता है। गहरी चोट लग जाने पर हल्दी का चूर्ण दूध के साथ पिलाते हैं। अलसी तेल, नमक और हल्दी की पुल्टिस बनाकर सूजन, दर्द एवं चोट वाले स्थानों की सिकाई की जाती है। हल्दी रक्त शोधक भी है। शरीर पर फुन्सियाँ उठने, चकत्ते जैसी पित्ती उछलने में हल्दी को शहद के साथ मिलाकर चाटते रहने की प्रथा है। पेट में कृमि पड़ने पर हल्दी का क्वाथ बनाकर पिलाया जाता है। खाँसी आने पर हल्दी के टुकड़े मुँह में पड़े रहने दिए जाएँ और उन्हें धीरे-धीरे चूसते लाभ होता है। जुकाम, सर्दी, सिर दर्द में गर्म दूध के साथ उसके उपयोग से बहुत लाभ होता है। रहा जाए, तो

               


     

आयुर्वेद के अनुसार हल्दी उष्ण, सौंदर्य बढ़ाने वाली, रक्तशोधक, कफ-वात नाशक, पित्त शामक एवं लीवर के लिए उत्तेजक मानी गई है। सर्दी लगने पर हल्दी की धूनी दी जाती है। सिरदर्द व साइनसाइटिस में हल्दी गुनगुने जल के साथ लेने से बलगम निकलता व सिर हल्का होता है। मूत्र रोगों मे इसका काढ़ा बहुत आराम देता है। आँखों के दुखने पर एक तोला हल्दी, एक पाव पानी में औटाकर कपड़े से छानकर आँखों में टपकाते हैं, तो लाली जल्दी मिटती है। प्रमेह में हल्दी के चूर्ण को आँवले के रस के साथ देते हैं। इसकी प्रयोग मात्रा किसी भी रोग में दो माशे से अधिक नहीं होनी चाहिए। अनुपान प्रायः गुनगुना जल, दूध या मधु होता है।

                


बाजारू हल्दी में ऊपर से नकली रंग पोता जाता है, ताकि ग्राहक को आकर्षक लगे, पर यह रंग हानिकारक पाए गए हैं। इसलिए बिना रंग की हुई हल्दी प्राकृतिक रूप में लेनी चाहिए। पिसी हल्दी में पीली मिट्टी मिलाकर उसका वजन भारी कर दिया जाता है। इस प्रकार के मिश्रण खाने वाले को अनेक प्रकार की हानियाँ पहुँचती हैं। इसलिए घर पर उगाई और पीसी गई हल्दी का उपयोग ही उचित है।

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